Tuesday, 21 April 2015

अनायस ही

छाई लालिमा सांझ के आकाश में थी,
मिट्टी की सौंधी सी ख़ुशबू
आबो हवा में थी घुली घुली
आप थे, मौका भी था और दस्तूर भी,
ऐसे में कुछ अनकहे अरमान मन के
ज़ुबान तक का रस्‍ता अनायस ही तय कर लिए.

...और अंत में

एक और प्रतिज्ञा करता हूँ,
अंगद सम फिर पाँव धरा पर धरता हूँ,
अडिग, अविचल, निश्चित प्रति पल
फिर से एक गाँठ मन में कसता हूँ.

निश्चित नहीं मगर कुछ भी,
जो बदला वही तो जीवंत आदमी,
जो रह गया निश्चल, निश्तेज निमित्त मात्र
वह तो बस पाषान सरीखा मूर्ति.

फिर कोई निश्चय ही क्यों करना है?
आगे ही क्यों बढ़ना है?
जैसे हर धार मिली है सिंधु से
हर जन्म को मृत्यु से ही जा मिलना है.

है अटल सत्य यही,
तो आज यहीं, और देर नहीं,
है बस एक अचल, अवीरल लक्ष्य 
जो न है बदला कभी,
और राह ? 
         हज़ारों हैं, कोई एक ही सही.

उड़ान



सूरज अगर हो डूब रहा,
दिन भी लगे ढलता हुआ,
नये सुबह का, याद रखना,
आह्वाहन बाकी है,
अभी मेरे पंखों में उड़ान बाकी है.

गुज़रते से जो लगे,
खुशनुमा लम्हों के वो सिलसिले,
दो आँसुओं के धार के बीच
भीनी सी एक मुस्कान बाकी है,
अभी मेरे पंखों में उड़ान बाकी है.

हार मिले रणक्षेत्र में,
ओझल हों लक्ष्य नेत्र से,
सपनों में मेरे आज भी
कुछ जान बाकी है,
अभी मेरे पंखों में उड़ान बाकी है.

माना धरती बंजर मेरे लिए,
यहाँ हर निःशवास खंजर मेरे लिए,
पर आज़माने को मेरे लिए
पूरा आसमान बाकी है,
अभी मेरे पंखों में उड़ान बाकी है.