एक और प्रतिज्ञा करता हूँ,
अंगद सम फिर पाँव धरा पर धरता हूँ,
अडिग, अविचल, निश्चित प्रति पल
फिर से एक गाँठ मन में कसता हूँ.
निश्चित नहीं मगर कुछ भी,
जो बदला वही तो जीवंत आदमी,
जो रह गया निश्चल, निश्तेज निमित्त मात्र
वह तो बस पाषान सरीखा मूर्ति.
फिर कोई निश्चय ही क्यों करना है?
आगे ही क्यों बढ़ना है?
जैसे हर धार मिली है सिंधु से
हर जन्म को मृत्यु से ही जा मिलना है.
है अटल सत्य यही,
तो आज यहीं, और देर नहीं,
है बस एक अचल, अवीरल लक्ष्य
जो न है बदला कभी,
और राह ?
हज़ारों हैं, कोई एक ही सही.
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